Thursday, August 23, 2012

हे विश्वमाता ! वर दो


 








हे विश्वमाता ! वर दो
न थकूं  न रुकूँ न गिरुं न झुकूं
न डरूं न मुड़ू  न ठिठकूँ  न ठहरूं
बस  अविचल भाव से लक्ष्य की दिशा में
 बढ़ता रहूँ  चलता रहूँ
कोई  प्रिय धोखा दे  देता रहे
समय परीक्षा ले  लेता रहे
  विपत्तियाँ   आती हैं आयें
 खुशियाँ जाती हैं जाएँ
सुख दुःख की  आंधियों में
 अखंडदीप की  भांति जलता रहूँ
  सांसारिक प्रलोभनों से निह्स्प्रिः
वीतराग सन्यासी की भांति चलता रहूँ
 विश्वासघातियों के लिए भी
मेरे मन में द्रोह न हो
  अपने  सगों से भी अनुचित मोह न हो
शत्रुओं से  भी  द्वेष न हो
मान - अपमान में तनिक भी आवेश न हो
मुझे अपने अस्तित्व का   सदा ज्ञान रहे
 ऋषियों का  वंशज  होने का अभिमान रहे
अपने  मार्ग पर सदा दृढ रहूँ
संकटों से कहूँ
 तुम्हारे  सामने झुकूँगा नहीं
लक्ष्य से पूर्व रुकुंगा नहीं ।